बच्चों के लिए
लिखना सबसे कठिन होता है। उसमें भी अगर बात बालगीतों की करें, तो कठिनाई और भी बढ़ जाती है। क्योंकि बच्चों के लिए लिखने के लिए लेखक को
स्वयं बच्चा बनना पड़ता है। तभी वह बच्चों की रुचियों, अभिरुचियों को जान-पहचान सकता है और तदनुरूप सहज, सरल, सुबोध भाषा में लिख सकता है। इसके अतिरिक्त बालगीतों में गेयता होना भी
अनिवार्य है। क्योंकि गेय रचना ही बच्चों की जबान पर चढ़ सकती है, जिसे वे खेल-खेल में गुनगुना सकते हैं, गा सकते हैं। इस दृष्टि से देखें
तो त्रिलोक सिंह ठकुरेला के प्रथम बालगीत संग्रह 'नया सवेरा’ की अधिकांश रचनाएँ खरी उतरती हैं। इनकी भाषा में सरलता है, तो भावों में सहज सुबोधता, विषयों में विविधता है तो बच्चों को
गुदगुदाने की क्षमता के साथ-साथ उन्हें खेल-खेल में उचित-अनुचित का ज्ञान कराने, उन्हें संस्कारित करने का गुण भी है। 'ऐसा वर दो’, 'जागरण’,
'मीठी बोली’, 'पढऩा अच्छा होता है’,
'प्रेम सुधा बरसायें’ आदि रचनाएँ बच्चों के चरित्र बनाने की भावना के अनुप्राणित हैं। श्री ठकुरेला
का आह्वान अवलोकनीय है-
बहुत सो लिये अब तो जागो
नया सवेरा लाना तुम।
फिर वह समय नहीं आता है
कभी भूल मत जाना तुम।।
'सीख’,
'चिडिय़ा घर’, 'अंतरिक्ष की सैर’,
'साइकिल’ आदि रचनाएँ पद्य कथा शैली में लिखी
गई हैं, जो निश्चय ही बालमन को भायेंगी। 'वर दो लडऩे जाऊँगा’ और 'देश हमारा’ रचनाएँ जहाँ देशप्रेम की भावनाएँ भरती
हैं, वहीं पर्यावरण-प्रदूषण एवं पानी की कमी जैसी ज्वलन्त समस्याओं की ओर भी कवि का
ध्यान गया है। 'पेड़’ शीर्षक कविता के माध्यम से वे बच्चों को
बताते हैं-
पेड़ों के इन उपकारों को
हम भी नहीं भुलायें।
आओ रक्षा करें वनों की
आओ पेड़ लगायें।।
पानी का महत्व
इस प्रकार समझातें हैं-
पानी से ही फसलें उगती
हर वन-उपवन फलता।
पानी से ही इस वसुधा पर
सब का जीवन चलता।।
निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि 'नया सवेरा’ का कवि बाल मनोभावों को समझने, उनकी रुचियों को जानने में सफल रहा
है। संग्रह की विविध रंगी अ_ाईस रचनाएँ ठकुरेला जी को बाल साहित्य
जगत में पहचान दिलवाने में समर्थ हैं। डॉ. अजय जनमेजय एवं डॉ.रमाकान्त श्रीवास्तव
के आशीर्वचनों से युक्त संग्रह राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर से अच्छी
साज-सज्जा में प्रकाशित हुआ है।
-डॉ.सत्यवीर 'मानव’
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