आज के उर्दू
शायरों में राजेन्द्र नाथ रहबर एक विश्वसनीय नाम है। उनका संग्रह याद आऊँगा इस
विश्वसनीयता की पुष्टि करता है। हिन्दी के पाठकों के लिए उन्होंने अपनी 88 $गज़लों और 13 नज़्मों को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया है। इसमें उनकी वह नज़्म भी
शामिल है जिसे गायक जगजीत सिंह ने अपनी आवाज देकर अमर कर दिया-
तेरे खत आज मैं
गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए
पानी में लगा आया हूँ
इसी नज़्म की ये पंक्तियाँ कितनी पाकीज़ा हैं-
कितना बेचैन
उन्हें लेने को गंगाजल था
प्यार अपना भी
तो गंगा की तरह निर्मल था
रहबर आम बोलचाल की भाषा में लिखते हैं। अपनी $गज़लों को वे किसी विशेष भाषा, सम्प्रदाय या संस्कृति में सीमित
नहीं करते-
सुबह सवेरे नूर
के तडक़े खुशबू सी हर जानिब फैली
फेरी वाले बाबा
ने जब संत कबीर का दोहा गाया
रहबर उस्ताद शायर हैं। अलग-अलग बहरों में लिखना, नये-नये का$िफये गढऩा और नई-नई रदी$फों का इस्तेमाल करना उनके बायें हाथ का
खेल है। नये-नये विषय उनकी हर $गज़ल को नया बना देते हैं-
जब शायरी हुई
है वदीअत हमें तो फिर
$गज़लें जहां को क्यों न सुनायें
नई-नई
$ गज़ल की परम्परा के अनुसार उन्होंने रोमांटिक शेर भी कहे हैं-
क्या जचे रहबर
गज़ल कोई किसी की अब हमें
हमने उन आँखों
को देखा है गज़ल कहते हुए।
और यह देखिए कितना सादा शेर है-
बाज़ार जाना आज
सफल हो गया मेरा
मुद्दत के बाद
उनसे मुलाकात हो गयी
रहबर के सबसे सुन्दर शेर वही हैं जिनमें सहजता और स्वाभाविकता है जैसे-
मैं तुमको ही
सोच रहा था
आओ तुम्हारी
उम्र बड़ी है
रहबर केवल महबूब के बारे में नहीं समाज के बारे में भी सोचते हैं-
हर सू मचा हुआ
है कोहराम बस्तियों में
तहजीब हो न
जाये नीलाम बस्तियों में
सूने पड़े हैं
मंदिर, वीरान मस्जिदें हैं
धूमें मची हैं
क्या-क्या बदनाम बस्तियों में
गिरते हुए मूल्यों पर उनकी चिंता देखिए-
जो कोई खाता है
करता है ज़हर अफ्शानी
हमारे अहद का
यारो अनाज कैसा है
और युवा वर्ग पर उनका कटाक्ष-
अल्लाह
निगेहबान, मेरा लाडला बेटा
डालर के लिए
अपना वतन छोड़ रहा है
रहबर केवल समस्याओं का वर्णन ही नहीं करते, उनके हल के लिए सुझाव भी देते हैं-
तू कृष्ण ही
ठहरा तो सुदामा का भी कुछ कर
काम आते हैं मुश्किल
में फकत यार पुराने
वे चेतावनी भी देते हैं-
कहीं जमीं से
तअल्लुक न खत्म हो जाये
बहुत न खुद को
हवा में उछालिए साहिब
देश, समाज और सांस्कृतिक मूल्यों में रहबर की गहरी आस्था है। उनकी नज़्मों 'ऐ वतन’,
'गणतंत्र दिवस’ और 'मन्नत’ में उनके विचार सुन्दरता से व्यक्त हुए
हैं। कुल 152 पृष्ठों की इस पुस्तक
के पहले 32 पृष्ठों में प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा रहबर के प्रति जारी प्रशंसा-पत्रों
को प्रकाशित किया गया है। समझ नहीं आता कि रहबर जैसे स्वयंसिद्ध शायर को अपने
संग्रह में ये प्रशंसा-पत्र प्रकाशित कराने की भला क्या आवश्यकता थी।
-विपिन सुनेजा 'सायक’
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