कौओं ने फिर सोंप दी, उल्लू को जागीर।
बोलो ऐसे राज की, होगी क्या तकदीर।।
महँगाई के दौर में, रोटी बनी सवाल।
कितनी सरकारें गई, बदल न पाये हाल।।
दोहाकार का व्यापक दृष्टिकोण एवं सकारात्मक सोच का ही प्रतिफल है कि आज की ज्वलन्त समस्याओं पर बहुत कुछ करने का सार्थक प्रयास किया है। भ्रष्टाचार, महँगाई, लूटमार आदि पर भी बहुत कुछ कहा गया है-
कौन सोचता देश की, किसको है पहचान।
कुर्सी का ये खेल है, कहाँ रहा इन्सान।।
असहाय मजदूर कीसोचनीय स्थिति पर अपनी हृदय वेदना को व्यक्त करते हुए दोहाकार का कथन कितना सटीक है-
पत्थर जिस्मों से बहे , श्रम सीकर की धार।
भूमि बनी कालीन है, अम्बर है संसार।।
आँसू, क्रन्दन, वेदना, भूख, तपन और प्यास।
रेतीला जीवन लिये, मृग तृष्णा की आस।।
चार चरणों में 13-11, 13-11 मात्राओं के साथ दोहे का अपना प्रवाह होता है और जब यह प्रवाह टूटता है तो उसका स्वरूप किसी विधवा के ललाट जैसा हो जाता है। यथा-
हाथ-हाथ छाले पड़े, फटी बिवाई पाँव।
सूखे-सूखे ओंठ हैं, मिलती पीर अभाव।।
दिन-दिन भर जो श्रम करें, उनको आती नींद।
धरती भी उनको लगे, रेशम के मानिन्द।।
कुल मिलाकर सूरज मले गुलाल दोहाकार का एक अच्छा प्रयास है, जिसमें भाषा, भाव एवं शिल्प की दृष्टि से दोहाकार की प्रतिभा स्पष्ट दिखाई देती है। उचित मूल्य के साथ समीक्ष्य कृति पठनीय एवं संग्रहणीय है।
-यादराम शर्मा, अलीगढ़
कृति-सूरज मले गुलालदोहाकार-अशोक गीते
पृष्ठ-110 मूल्य-120
प्रकाशक-संवेदना प्रकाशन, ट्रक गेट,
पावर हाऊस,अ कासिमपुर, अलीगढ़
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