Friday, February 20, 2015

श्रमसाध्य दस्तावेज है हरिऔध का सौंदर्य चित्रण



बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व के धनी लब्धप्रतिष्ठ चर्चित रचनाकारों की बहुआयामी रचनाधर्मिता पर सम्पन्न हुए शोध कार्यों को तो पुस्तकाकार में आना ही चाहिए-इससे एक ओर संबंधित रचनाकार का बहुमुखी परिचय नयी पीढ़ी से होता है वहीं शोध अभियान को भी नयी व्यवहारिक ऊंचाइयां प्राप्त होती हैं। ऐसा ही एक श्रमसाध्य प्रयास है शोधार्थी डा. विजय इंदु के शोध पर आधारित आलोच्यकृति हरिऔध का सौंदर्य चित्रण, जिसमें नवयुग के अग्रदूत एवं मुक्तक के बादशाह कहे जाने वाले यशस्वी रचनाकार हरिऔध की करीब पचास पुस्तकों की विराट रचनाधर्मिता में सौंदर्य चित्रण पक्ष को रेखांकित किया गया है।
शोधार्थी-लेखिका डा. इंदु के शोध, अध्ययन एवं लेखन के प्रति गंभीर जुनून का अंदाजा इस पहलू से लगाया जा सकता है कि वे हिंदी, संस्कृत में पीएचडी के अलावा, नेट, जेआरएफ भी हैं।  अपने शोध गुरु डा. रामसजन पांडेय के प्रेरक मार्गदर्शन में इस शोध कार्य को उन्होंने शोध प्रविधि के तहत छह अध्यायों में बांटा है। प्रथम अध्याय में सौंदर्यबोध की अवधारणा, द्वितीय अध्याय में हरिऔध के सौंदर्यबोध का पृष्ठाधार, तृतीय अध्याय में हरिऔध के साहित्य में मानवीय सौंदर्य, चतुर्थ अध्याय में हरिऔध के साहित्य में असीम का सौंदर्य निरुपण, पांचवें अध्याय में हरिऔध का प्रकृति-परिवेश तथा छठे अध्याय में हरिऔध का अभिव्यक्ति सौंदर्य शामिल किया गया है।
उल्लेखनीय है कि काशी विश्वविद्यालय में दो दशकों तक हिंदी सेवा करने वाले प्रख्यात रचनाकार अयोध्यासिंह उपाध्याय ने अपने काव्यगुरु हरिसुमेर से अभिप्रेरित होकर उनके पर्याय हरिऔध नाम से ब्रजभाषा तथा हिंदी में रचनाधर्मिता के नये आयाम स्थापित किए। मुक्तक, गीत, प्रबंधकाव्य, नाटक, उपन्यास, निबंध, आलोचना, कहानी, बाल साहित्य, गद्य-गीत, आलोचना, ललित साहित्य आदि विभिन्न विधाओं में उन्होंने करीब चार दर्जन रचनाएं दी तथा अपने छह दशक के लेखकीय जीवन की आखिरी सांस तक निरंतर सृजनरत रहे। इनकी रचनाधर्मिता में सौंदर्य-चित्रण का प्रामाणिक सूक्ष्म अध्ययन करते हुए डा. इंदु ने उन्हें प्रियप्रवास जैसी काव्य रचनाधर्मिता के लिए महाकवि, रुक्मिणी परिणय के लिए श्रेष्ठ नाटककार, इतिवृत के लिए प्रेरक निबंधकार बेनस का बांका हेतु सतर्क अनुवादक, कबीर वचनावली हेतु कुशल संपादक, चारु चरितावली हेतु चरित्र लेखक, कृष्ण शतक हेतु ब्रजभाषा के मर्मज्ञ करार दिया है। लेखिका ने उनके समग्र साहित्य में संबंधित विषय के साथ भाषा, छंद, प्रतीक, बिंब, मुहावरे, लोकोक्तियों आदि का भी प्रभावी विवेचन किया है।
युगों-युगों से साहित्य, कला एवं संस्कृति का आधार रहे सौंदर्य के रूप, भाव व कर्म की त्रिवेणी को इस शोध में झरते देखा जा सकता है। कृति सारांश तौर पर शील व कर्म के सौंदर्य से जुड़े मानवीय गुणों शील, संयम, वीरता स्पूर्ति, उत्साह, त्याग, मर्यादा, बलिदान, वीरता, इंद्रिय निग्रह, क्षमा, करुणा का जीवंत चित्रण है।
हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर द्वारा प्रकाशित इस शोध ग्रंथ की छपाई बेहद सुंदर तथा आवरण आकर्षक है। संदर्भ सूचियों से शोधकार्य की गंभीरता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। सूरदास के सौंदर्य पर शोध कर चुकी लेखिका डा. इंदु ने स्कूल शिक्षा विभाग में रहते हुए करीब एक दर्जन शोध पत्र एवं उक्त दो गंभीर शोध अभियान प्रभावी ढ़ंग से सम्पन्न कर शोध साहित्य की सच्ची सेवा की इस श्रमसाध्य कार्य के लिए वे बधाई एवं साधुवाद की पात्र हैं।
सत्यवीर नाहडिय़ा
पुस्तक : हरिऔध का सौंदर्य चित्रण
लेखक : डा. विजय इंदु
प्रकाशक : हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर
मूल्य : 500 रु. पृष्ठ : 319

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