Saturday, February 21, 2015

धूप-छाम की ढ़ाल़, जाण दुख-सुख का जोड़ा


एक दोहा और एक रोला के मेल से बने छह चरणों का मात्रिक छंद कुंडलिया का नाम आते ही 'कह गिरधर कविरायÓ अनायास जुबान पर आ जाता है। शिल्प-सौष्ठव की कसावट इसे छंद अनुशासन से ही मिलती है। गिरधर जी के बाद कुण्डलीकार ज्यादा चर्चित नहीं हुए तथा कुंडलिया छंद भी हासिये पर ही रहा किंतु अब ऐसा नहीं है। जिस प्रकार शोध एवं साहित्य की प्रमुख पत्रिका 'बाबू जी का भारतमित्रÓ ने पिछले दिनों पहला कुंडलिया-विशेषांक निकालकर नवप्रयोग किया, उसी प्रकार हरियाणवी भाषा में प्रथम कुंडलिया संग्रह का प्रकाशित होना इस विधा तथा हरियाणवी रचनाधर्मिता के लिए एक नया पड़ाव कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस अनूठी रचनाधर्मिता का श्रेय जाता है पांच हरियाणवी दोहा सतसई लिख चुके लब्धप्रतिष्ठ हरियाणवी रचनाकार हरिकृष्ण द्विवेदी को, जिन्होंने  'धूप छामÓ नामक हरियाणवी कुंडलिया संग्रह से नये आयाम रचे हैं। हरियाणा प्रदेश के कैथल जिले के साहित्यिक ग्राम पाई को हरियाणवी $गज़ल (कंवल हरियाणवी) की बाद अब हरियाणवी कुंडलिया (हरिकृष्ण द्विवेदी) देने का दिव्य संयोग प्राप्त हुआ है।
आलोच्य कृति श्री द्विवेदी की छठी कृति है। इससे पूर्व पांच दोहा सतसइयों के रूप में उनकी पांचों कृतियां बोल बखत के, अमरतबाणी, मसाल, पनघट तथा जनबाणी बेहद चर्चित एवं पुरस्कृत रही हैं। धूप छाम (धूप छांव)  नामक कृति के माध्यम से दोहाकार से कुंडलीकार बने श्री द्विवेदी की 236 कुंडलियां कला, भाव एवं शिल्प की दृष्टि से तो बेजोड़ हैं ही, ये रचनाएं जीवनमूल्यों एवं आध्यात्मक की अनूठी दस्तावेज भी बन पड़ी हैं।
संग्रह की भावभूमि का अंदाजा शीर्षक कुंडलिया से सहज ही लगाया जा सकता है-
जोड़ा जग-मसहूर सै, सुणिये करकै कान।
हार-जीत टोट्टा नफा, जस-अप जस इनसान।
जस-अपजस इनसान, होड़ सै पाप-धरम की।
कह्या करैं बिदवान, लड़ाई ग्यान-भरक की।
गैल जनम के मौत, मिलण के संग बिछोड़ा।
धूप-छाम की ढ़ाल़, जाण दुख-सुख का जोड़ा।
रचनाकार ने सामाजिक विसंगतियो, विद्रुपताओं, विषमताओं, विडम्बनाओं को रेखांकित करते हुए न केवल करारे कटाक्ष किए हैं, लोकसंस्कृति एवं लोकमूल्यों का भावपूर्ण स्मरण करते हुए उन्हें आत्मसात करने का आह्वान भी किया है। ठेठ हरियाणवी शब्दावली, लोकोक्तियों व मुहावरों का प्रयोग तथा विलुप्त होते हरियाणवी शब्दों को सहेजना संग्रह की अन्य विशेषताएं हैं।
छंदशास्त्र एवं संगीत के मर्मज्ञ होने के कारण जहां श्री द्विवेदी की तमाम रचनाओं में शिल्प सौंदर्य प्रभाव छोड़ता है वहीं आध्यात्मिक विचारक होने के चलते संग्रह का भाव एवं कला  पक्ष भी बेहद उज्ज्वल है। हरियाणवी $गज़लकार रिसाल जांगडा ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही कहा है कि धूप छाम रचकर श्री द्विवेदी ने हरियाणवी कुंडलिया छंद की कुण्डली लिख दी है।
अनीता पब्लिशिंग हाउस, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित धूप छाम की छपाई बेहद सुंदर तथा आवरण शीर्षकानुरूप एवं कलात्मक है। कहीं-कहीं प्रुफ की अशुद्धियां अखरती हैं। यह संग्रह हरियाणा साहित्य के लिए एक उपलब्धि से कम नहीं है तथा शोधार्थियों के लिए भी आधार सामग्री का काम करेगा। यह कृति श्री द्विवेदी को कुंडलिया छंद का हरियाणवी जनक के रूप में प्रतिष्ठापित करते हुए-कुंडलिया साहित्य को समृद्ध करेगा-ऐसा विश्वास है।


सत्यवीर नाहडिय़ा
संपर्क सूत्र : 9416711141 
पुस्तक : धूप छाम
लेखक : हरिकृष्ण द्विवेदी
प्रकाशक : अनिता पब्लिशिंग हाउस, गाजियाबाद
मूल्य : 200 रु. पृष्ठ : 95

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