मानुषी संवेदना की
मर्मस्पर्शी अनुभूति और उसकी छान्दसिक अभिव्यक्ति, भारतीय काव्यकला की आधारभूमि रही
है। वैदिक ऋचाएँ तथा प्रथम लौकिक काव्य, बाल्मीकि रामायण इस कथन के साक्षी हैं। दोहा छन्द
अपनी छान्दसिक परंपरा में अग्रणी रहा। समय की अविच्छिन्न धारा में समाज-सापेक्षता
के अनुरूप, काव्यविधाएँ, शिल्पान्तरित होती रही और प्राकृत युग में छान्दसिक भ्रूण के रूप में विद्यमान
'दोहा' (दोग्धक, दोधक, दूहक, दूहा आदि संज्ञाओं वाला)
छंद अपभ्रंश में उद्भूत होकर निरन्तर वर्धमान होता रहा। हिन्दी साहित्य के
आदिकालीन अपभ्रंश साहित्य (प्रमुखत: जैन एवं सिद्ध काव्यधारा) में दोहा छन्द
पूर्णता प्रौढ़ता और प्रसिद्धि प्राप्त हुआ, अवहट्ट (पुरानी हिन्दी) में
विराजमान हुआ। कालान्तर में भक्तिकाल और रीतिकाल में तो यह प्रमुखता एवं
प्रभाववत्ता के साथ प्रतिष्ठित रहा। आधुनिक काल में भारतेन्दु युग तक दोहा,
ब्रजभाषा मिश्रित
हिन्दी में लिखा जाता रहा। द्विवेदी युग, खड़ी बोली की साहित्यिक प्रतिष्ठा का विशेष आग्रह
लेकर आया तथा इस काल खंड में संस्कृत के वर्णिक एवं मात्रिक छन्दों को खड़ी
बोली-काव्य भाषा में साग्रह निरूपित किया गया। इन्हीं छन्दों में लिखा गया अयोध्या
सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का 'प्रिय
प्रवास' खड़ी
बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। छायावादी कवियों, प्रमुखत: प्रसाद, निराला, पन्त और महादेवी आदि ने
अपनी शालीन एवं उदात्त काव्याभिव्यक्ति के लिए अनेकानेक नये छन्दों को आविर्भूत
किया। प्रगतिवाद व प्रयोगवाद, नई कविता, साठोत्तरी कविता, अकविता आदि काव्यान्दोलनों के चलते, धीरे-धीरे कविता,
छान्दसिकता से
लगभग विरत होती गई और आज तो वह छन्दमुक्त ही हो गई है, यह बात अलग है कि इसे 'गद्यकविता' न कहकर नई कविता
(अकविता) के पक्षधर लोग 'मुक्तछन्द कविता' कहते हैं, गोया ये बुद्धिजीवी, छन्द जैसे साधनाप्रसूत कवि-कर्म
से तो मुक्ति चाहते हैं, पर छान्दसिकता से कहीं न कहीं नाता जोड़े रखना चाहते हैं,
इसीलिए अद्यतन 'गद्यकविता' में यदा-कदा शब्दों की
आन्तरिक लय, ताल और पठनीयता के प्रवाह आदि की बातें होती रहती हैं।
यद्यपि अकविता के इस दौर
में भी छन्दोबद्ध काव्य रचनाएँ, अल्पमात्रा में ही सही, होती रहीं, किन्तु 'दोहा' प्राय: अदृश्य हो गया।
स्वातन्त्र्योत्तर
हिन्दी साहित्य में दुष्यंत की $गज़लों के प्रखर एवं उल्लेखनीय प्रभाव को देखते हुए यह
महसूस किया गया कि हिन्दी में क्या कोई ऐसी विधा नहीं है, जिसकी दो पंक्तियों में उर्दू गज़ल की तरह प्रखर,
प्रभावी और चुटीली
बातें कही जा सकें। संभवत: इसी विचार ने अस्सी के दशक के आसपास दोहा छन्द की वापसी
का काम किया। आज तो दोहा, हिन्दी काव्य विधा के केन्द्र में है। चार चरणों और 48 मात्राओं वाले इस छन्द
के विषम चरणों में तेरह-तेरह तथा सम चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ, मानक बनी हुई हैं। प्रथम
तथा तृतीय चरण के प्रारम्भ में जगण नहीं होना चाहिए। दूसरे और चौथे पद के अन्त में
क्रमश: एक गुरु और एक लघु होना चाहिए। यह एक ऐसा छन्द है, जिसे उलट देने से 'सोरठा' तथा आदि और अन्त में
दो-दो मात्राएँ बढ़ा देने से 'उल्लाला' छंद बन जाता है। मात्राओं के इस घटत-बढ़त या उलट-फेर से कई
अन्य छंद बन जाते हैं।
आज के दोहे अपनी पुरानी
पीढ़ी से कई सन्दर्भों, अर्थों आदि में विशिष्ट हैं। इनमें भक्तिकालीन उपदेश,
पारंपरिक रूढिय़ाँ
और नैतिक शिक्षाएँ नहीं हैं, न ही रीतिकाल की तरह शृंगार। अभिधा से तो ये बहुत परहेज
करते हैं। ये दोहे तो अपने समय की तकरीर हैं। युगीन अमानुषी भावनाओं, व्यवहारों और
परिस्थितियों के प्रति इनमें जुझारू आक्रोश है, प्रतिकार है, प्रतिवाद है।
इनके पास एक तीसरी आँख
भी है जिसके द्वारा ये अपने काइयाँ समय के प्रच्छन्न छल-छद्म की नकाबपोशी को
तार-तार कर देते हैं। इनकी अर्धगर्भी ध्वनियाँ, सहृदयों को व्यंजना के कई-कई
गन्तव्यों का पता देती हैं। इनकी प्रखर, प्रभावी सम्प्र्रेषणीयता, वैचारिक स्तर पर, अनेक सवाल खड़े करती है।
सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध व्यावहारिकता की प्रेरिका बनती है। नई 'ज़मीनÓ पर नई 'कहनÓ के साथ अधिष्ठित आज के
दोहे, सवर्था
काम्य हैं-
दोहे 'दरपन' वक्त के, मौजूदा तकरीर।
किसी यक्ष की त्रासदी,
नागमती की पीर।।
काया इनकी 'वामनी, माया किन्तु अनन्त।
कभी संत बन कर रहा,
कभी बना सामन्त।।
हर मंजि़ल हर मोड़ पर,
इसने छोड़ी छाप।
काया तो है वामनी,
लिया सभी कुछ
नाप।।
प्राकृत युग से आज तक,
पा कितनों का
प्यार।
इस दोहे ने रचे हैं,
कितने ही संसार।।
सब मुरीद इसके रहे,
मीर, औलिया, पीर।
नरम पड़ा 'तुलसी' बना, अक्खड़ हुआ 'कबीर'।।
गीत और नवगीत से,
आगे है गतिमान।
इसे $गज़ल ने भी दिया,
स्वीकृति औ' सम्मान।।
-डॉ.राधेश्याम शुक्ल, हिसार
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