Saturday, June 27, 2015

कविता - कम्मी ठाकुर

मैं समझ नहीं पाया

मैं अभी तक
समझ नहीं पाया
आखिर कैसे
युग-युगातंर की अच्छाई और सच्चाई
एक पल में
झूठ व बुराई से
हार जाती है
क्यों वर्षों के तप, यश,
सद्कर्म, धर्म और भलाई की कमाई
एक छोटी-सी भूल छीन लेती है

मैं आज तक
समझ नहीं पाया
दुनिया में अच्छाई, सच्चाई
और बुराई की सांकेतिक परिभाषा
क्योंकि अच्छाई और सच्चाई की डगर
संयमित, कठोर और विशाल
पदबंदो के बावजूद
अपने उसूलों, सिद्धांतो, नैतिकता
और मानवीय मूल्यों की स्थापना में
सदैव सीमान्त सैनिक की भाँति
अडिग, सतर्क और सावधान रहती है
किंतु फिर भी एक छोटी-सी
बुराई की गोली और बोली
उस कवचयुक्त सच्चाई और अच्छाई
की प्रतिमा को पलभर में
विखंडित कर उसे बदनाम कर देती है
फिर सच्चाई और अच्छाई को
अपने वजूद की खातिर
दुनिया में यदा-कदा-सर्वदा
महाभारत लड़़नी पड़ी है
भीष्म प्रतिज्ञा करनी पड़ी है
फिर भी आज स्थिति वहीं खड़ी है
इसके विपरीत अच्छाई व सच्चाई को
अपना अस्तित्व साबित करने के लिए
लम्बा संघर्ष करना पड़ता है
राम को वनवास,
भरत को सिंहासन त्याग,
पांडवों को अज्ञातवास
और कुमार श्रवण को
चार धाम से गुजरना पड़ता है
किंतु फिर भी आखिर क्यों
बुराई का साम्राज्य शाश्वत् है
और इंसां उस पर आशवस्त है
यह ज्ञात होते हुए भी कि
रहती सदैव अन्त में
विजय, अमर बाईबल, कुरान,
गुरू ग्रन्थ साहिब और गीता भागवत है
गीता भागवत है।

 कम्मी ठाकुर ‘‘मुसाफ़िर’’

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