कहानी
चालीस वर्ष बाद बस में अचानक मुलाकात हो गई राकेश और सुनीता की। कालेज में साथ साथ पढ़ते रहे थे, उम्र चाहे बढ़ गई हो तब भी पहचान ही लिया था सुनीता ने राकेश को जो दूसरी तरफ बैठा था। और उठ कर उसके पास जाकर कहा था, हैलो राकेश कैसे हो। राकेश भी पहचान गया था सुनीता को, बोला था अरे आप सुनीता जी, नमस्कार, मैं अच्छा हूं आप कैसी हैं। इतने साल हो गये, अचानक आपसे मिलकर बहुत खुशी हो रही है। मुझे भी आपको देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा है, क्या आप भी दिल्ली जा रहे हैं, सुनीता ने पूछा था। हां दिल्ली में बेटा जॉब करता है, उसके पास जा रहा हूं, रहता अभी भी अपने शहर में ही हूं, राकेश ने बताया था। फिर पूछा था कि आप क्या दिल्ली में रहती हैं आजकल। नहीं, सुनीता बोली थी, मेरी शादी तो राजस्थान में हुई थी और वहीं रहती हूं, छोटी बहन रहती है दिल्ली में, उसके पास जा रही हूं। सुनीता ने कहा था, आप उधर आकर बैठ जाओ मेरे साथ की सीट खाली है, साथ साथ बैठ कर बातें करेंगे। और राकेश सुनीता के साथ जाकर बैठ गया था। कालेज की बातें, फिर अपनी ज़िंदगी की बातें, अपने परिवार की जीवनसाथी की, बच्चों की बातें इक दूजे से पूछने बताने लगे थे। आपस में मोबाईल फोन नम्बर लिये-दिये गये ताकि आगे भी बात होती रहे। यूं ही बात चली तो पता चला कि दोनों ही फेसबुक पर भी हैं, फोन पर ही राकेश ने सुनीता को अपनी प्रोफाईल दिखाई थी और फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट भी भेज दी थी। सुनीता ने बताया कि वो फेसबुक पर कभी कभी ही रहती है, और उसने पूछा था राकेश क्या आप मुझे अपना इमेल दे सकते हैं। क्यों नहीं, राकेश ने कहा था, और ऐसे दोनों ने अपना ईमेल दे दिया था। कुछ घंटे कैसे बीत गये थे दोनों को पता तक नहीं चला था, दिल्ली पहुंच कर जब अलग होने लगे तब सुनीता ने पूछा था कि क्या वो ईमेल पर आपस की बातें आगे भी करते रहेंगे। राकेश का जवाब था कि बेशक वो मेल कर सकती है और राकेश ज़रूर जवाब दिया करेगा। सुनीता ने ये वादा भी लिया था कि दोनों की दोस्ती की बात इक दूजे तक ही रहेगी।
राकेश को कुछ दिन बाद सुनीता का भेजा मेल मिला था। सुनीता ने लिखा था, शायद ये बात आपको पहले भी कालेज के ज़माने में महसूस हुई हो कि मैं आपको बेहद पसंद करती थी। मगर तब आप लड़के होकर भी नहीं कह सकते थे ये बात तो मैं एक लड़की अगर कहती तो आवारा समझी जाती। फिर भी एक बार मैंने आपकी किताब में एक पत्र रखा था, आपसे किताब मांगी थी और अगले पीरियड में पत्र रख कर वापस भी कर दी थी। मगर उसके बाद इक डर सा था कि कहीं कोई दूसरा न पढ़ ले, तभी कालेज का समय समाप्त होते ही फिर आपसे किताब मांग ली थी इक दिन को। सच कहूं वो पत्र मैंने कभी फाड़ा नहीं था, दिल पर लिखा हुआ है आज तक, मालूम नहीं ये बात बताना उचित है या अनुचित, मगर इक सवाल हमेशा मेरे मन में रहता रहा है कि अगर मैंने तब वो पत्र आपको पढ़ने दिया होता तो क्या आज मेरी ज़िंदगी कुछ अलग होती और शायद आपकी भी। क्या ये हम दोनों के लिए सही होता। ऐसा बिल्कुल नहीं कि मुझे कोई शिकायत हो अपने जीवन से या किसी से भी, पर यूं ही सोचती हूं कि तुम साथ होते तो क्या होता। खाली समय में जाने कितनी बार ये सवाल मैंने खुद से किया है। पता नहीं आपको याद भी है या नहीं कि एक बार वािर्षक समारोह में मंच पर हमने साथ साथ गीत गया था। तब जब उसकी फोटो देखी थी तब वो एक ही थी और मैंने आपको कहा था कि ये मुझे लेने दो और आप ने ली हुई वापस कर दी थी मेरे लिये। मेरे पास हमेशा वो फोटो रही है और वो गीत हमेशा गुनगुनाती रहती हूं मैं। राकेश मैंने उस पत्र में लिखा था तुम मेरे सपनों के राजकुमार हो, मेरे मन में रहते हो, मुझे नहीं पता कि उसको प्यार कहते हैं या मात्र आकर्षण, मगर वो भावना मैंने और किसी को लेकर कभी महसूस नहीं की थी। मैंने आपसे वादा लिया था आपस की बात किसी को नहीं बताने का रास्ते में बस में सफर में तो केवल यही बात बताने के लिये, जो जाने क्यों मुझे बतानी भी ज़रूरी थी और पूछनी भी कि आप क्या सोचते हैं इसको लेकर।
राकेश ने बार बार पढ़ा था, सुनीता की मेल का इक इक शब्द बता रहा था कि उसने जो भी लिखा है सच्चे मन से और साहसपूर्वक लिखा है। राकेश ने सुनीता को रिप्लाई किया था ये लिख कर। मुझे नहीं मालूम कि आपको अब ये सारी बातें मुझे कहनी चाहिएं अथवा नहीं, हां इतना जानता हूं कि जो आपने अपने दिल में अनुभव किया उसमें कुछ भी न तो अनुचित था न ही अस्वाभाविक। अपने मन की सोच पर, पसंद, नापसंद पर किसी का बस नहीं होता है। इतना ज़रूर मैं भी आपकी ही तरह सच और इमानदारी से बताना चाहता हूं कि मुझे उस दिन आपसे मिलकर बहुत ही अच्छा लगा था और आज ये आपकी बातें पढ़कर भी इक खुशी अनुभव कर रहा हूं। खुशी इस बात की है कि शायद जीवन में पहली बार मुझे ये एहसास हुआ है कि कोई है जो दुनिया में मुझे भी पसंद करता है, चाहता है। नहीं मुझे भी किसी से ज़रा भी शिकवा शिकायत नहीं है, मगर ये भी हकीकत है कि मुझे इस दुनिया में कभी भी तिरिस्कार और नफरत के सिवा कुछ भी मिला नहीं किसी से। सच कहूं तो मैंने खुद ही कभी सोचा ही नहीं कि मैं भी किसी के प्यार के काबिल हूं। मुझसे हर किसी को शिकायत ही रही है, मैं हमेशा इस अपराधबोध को लेकर जिया हूं कि मुझे जो भी सभी के लिये करना चाहिए वो चाह कर भी मैं कर सका नहीं जीवन भर। इसलिये मुझे यही लगता है कि ये अच्छा ही हुआ जो आपने वो पत्र मुझसे वापस ले लिया था मेरे पढ़ने से पहले ही। वरना जो भावना आज चालीस वर्ष बाद भी आपके मन में मेरे प्रति बाकी है वो शायद नहीं रह पाती। मैं आपको कुछ भी दे नहीं पाता ठीक उसी तरह जैसे अन्य किसी को नहीं दे सका हूं। शायद किसी को नहीं मालूम कि मैं खुद इक तपते हुए रेगिस्तान की तरह हूं। जो खुद इक बूंद को तरसता रहा उम्र भर वो भला किसी की प्यास कैसे बुझा सकता था। सुनीता आपकी भावना मेरे लिये किसी बदली से कम नहीं है। इसलिये ये अच्छा हुआ जो मैंने आपका वो पत्र नहीं पढ़ा, आपकी ये मेल भी डिलीट कर दूंगा, जैसा आपने लिखा है, मगर ये सब अब मेरे भी मन में कहीं रहेगा हमेशा। मैं आपको ये सब लिखने पर क्या कहूं, मैं नहीं समझ पा रहा। धन्यवाद या मेहरबानी जैसे शब्द काफी नहीं हैं। हम जब तक हैं अच्छे दोस्त बन कर ज़रूर रह सकते हैं। मुझे आपके जवाब की प्रतीक्षा रहेगी। शायद मैं आपको अब कोई खुशी दे सकूं मित्र बन कर ही।
सुनीता का संक्षिप्त सा जवाब मेल भेजने के थोड़ी देर बाद ही आ गया था, लगता है जैसे उसको इंतज़ार था राकेश की मेल का और पढ़ते ही रिप्लाई कर दिया था। लिखा था, हो सकता है मुझे आपसे कुछ भी हासिल नहीं होता, जैसा आपने लिखा है, कारण चाहे जो भी हों। मगर मुझे अफ़सोस है तो इस बात का कि मैं वो बदली हूं जो शायद आपकी प्यास बुझा सकती थी। जो कभी बरस ही नहीं पाई।
-डा. लोक सेतिया
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