Saturday, May 23, 2015

अदा जाफ़री की ग़ज़ल

आख़िरी टीस आजमाने को,
जी तो चाहा था मुस्कराने को|

याद इतनी-सी सख्त-जां तो नहीं,
इक घरौंदा रहा है ढाने को|

संगरेजों में ढल गए आंसू,
लोग हँसते रहे दिखाने को|

ज़ख्में नग्ना भी लौ तो देता है,
इक दीया रह गया जलाने को|

जलने वाले तो जल-बुझे आख़िर,
कोई देता खबर ज़माने को|

कितने मजबूर हो गए होंगे,
अनकही बात मुंह पे लाने को|

खुलके हँसना तो सबको आता है,
लोग तरसते हैं इक बहाने को|

रेजा-रेजा बिखर गया इंसा,
दिल की विरानियाँ जताने को|

हसरतों की पनाहगाहों में,
क्या ठिकाने हैं सर छुपाने को|

हाथ काँटों से कर लिए ज़ख़्मी,
फूल बालों में इक सजाने को|

आस की बात हो कि सांस 'अदा'
ये खिलौने थे टूट जाने को||


संगरेजों=पत्थर के कण 
रेजा-रेजा=कण-कण


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