Monday, May 4, 2015

डॉ.लोक सेतिया 'तनहा' की ग़ज़ल

गम से इतनी मुहब्बत नहीं करते
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते।
ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन
लोग फिर भी बगावत नहीं करते।
इस कदर भा गया है कफस हमको
अब रिहाई की हसरत नहीं करते।
आप हँस-हँस के गैरों से मिलते हैं
हम कभी ये शिकायत नहीं करते।
पाँव जिनके ज़मीं पर हैं, मत समझो
चाँद छूने की चाहत नहीं करते।
तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते।
पास कुछ भी नहीं अब बचा 'तन्हा'
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते।
-डॉ.लोक सेतिया 'तन्हा' ,फतेहाबाद



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