आज भी जि़न्दगी का स$फर है वही
दाल रोटी की अब भी फिकर है वही
नींव घर की पसीने से जो सींचा था
उम्र बढ़ते ही अब दर-ब-दर है वही
यूँ सियासत ने फिर अपना रंग बदला है
दुुश्मनों में जो था-मोतबर है वही
इक परिन्दा नहीं ठँूठे से पेड़ पर
कल फलों से लदा था, शज़र है वही
चाँद पर हम पहुँच तो गये हैं मगर
जि़न्दगी की डगर पुर$खतर है वही
-उषा यादव 'उषा', इलाहाबाद
दाल रोटी की अब भी फिकर है वही
नींव घर की पसीने से जो सींचा था
उम्र बढ़ते ही अब दर-ब-दर है वही
यूँ सियासत ने फिर अपना रंग बदला है
दुुश्मनों में जो था-मोतबर है वही
इक परिन्दा नहीं ठँूठे से पेड़ पर
कल फलों से लदा था, शज़र है वही
चाँद पर हम पहुँच तो गये हैं मगर
जि़न्दगी की डगर पुर$खतर है वही
-उषा यादव 'उषा', इलाहाबाद
bahut-2 shukriya sir ji
ReplyDelete