दौर हवाओं का शीतल, फिर आने वाला है
सूरज फिर चन्दा से, हाथ मिलाने वाला है
दु:ख की जलती धूप सिरों से अब हट जायेगी
सुख का बादल आसमान पर छाने वाला है
जमीं नही पाँवों के नीचे कांटे बोयेगी
समय सब जगह हरियल घास बिछाने वाला है
भूख नही निर्धन बच्चों को आँख दिखायेगी
पोटली वाला बाबा, रोटी लाने वाला है
हर बच्चा बस्ता लेकर पढने को जायेगा
मजदूरी का बोझा, बस हट जाने वाला है
नौकरियों के लिये, कोई शिक्षित ना भटकेगा
हरेक हाथ को रोजगार, मिल जाने वाला है
आग दहेज की कभी किसी, बेटी पे ना आयेगी
फर्क बहू - बेटी का अब, मिट जाने वाला है
भाई भाई के बीच , ना अब दीवारें उट्ठेगी
हरदिल सद् भावों के, बाग लगाने वाला है
रिश्तों की मर्यादायें, हर कोई निभायेगा
प्रेम, प्यार, भाईचारा, फिर आने वाला है
बड़े बुजुर्गो को हरदम, सम्मान सभी देगें
वृद्ध आश्रमों पर ताला लग जाने वाला है
नीति, नियम, संस्कारों के, उपवन महकेंगें
मानवता का फिर परचम लहराने वाला है
संस्कार अपने, सारी दुनिया अपनायेगी
भारत फिर से विश्व गुरु, कहलाने वाला है
-ताराचन्द शर्मा "नादान"
वाह बहुत सुन्दर
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