Thursday, April 9, 2015

कुण्डलिया छंद डॉ.तुकाराम वर्मा

किनके साथी चोर हैं, किनके क्रूर डकैत।
समझो किनके सामने, रहते खड़े लठैत।।
रहते खड़े लठैत, न सच-सच कहने देंगे।
अगर दिये न वोट, तुरत वह दम ले लेंगे।
नहीं बचेंगे मित्र, घरौंदों तक के तिनके।
वधिकों जैसे कार्य, हुए हैं परखो किनके?


अब सरकारें दे रही, क्रूरों को सम्मान।
वोट बटोरू खेल को, खेल रहे शैतान।।
खेल रहे शैतान, बना के दल के पाले।
फैलाते हैं खौफ, पड़े जीवन के लाले।
काले धन को श्वेत, बनाती हैं बाजारें।
नियमों से बेख़ौफ़, हमारी अब सरकारें।।

दोषी को होने लगे, अगर शीघ्रतम जेल।
तो रुक सकते देश में, भ्रष्टाचारी खेल।।
भ्रष्टाचारी खेल, अनैतिक चलन बढ़ाते।
सामाजिक विद्रोह, कराकर चैन छिनाते।
होती प्रगति निरुद्ध, पनपती है खामोशी।
करो जेल के बीच, उन्हें जो भी हों दोषी।।

शैतानों के योग से, नोट मिलें भरपेट।
तो वोटों के खेल के, होंगे ही आखेट।
होंगे ही आखेट, भले कुछ जानें जायें।
सत्ताधारी फस्ल, जला दें खेत गँवायें।
रहे चौधरी साथ, किसानों अरमानों के।
जमने दिए न पैर, उन्होंने शैतानों के।।

ऐसी बांछा से सखे, शायद हो कल्याण।
देवालय के पूर्व दें, शौचालय पर ध्यान।
शौचालय पर ध्यान, यहाँ है बहुत जरूरी।
समझें आखिर आप, चुनावी यह मजबूरी।
बेबस जनता नित्य, सहे शर्मिन्दी कैसी।
गाँव शहर में आज, कहाँ है सुविधा ऐसी?

सत्ता मद से हो गया, इतना कुंद विवेक।
राजनीति में हो रहा, पाखण्डी अभिषेक।।
पाखण्डी अभिषेक, मुसीबत जनता झेले।
छल-छद्मों के खेल, घिनौनेपन ने खेले।
$फरत की जलवायु, उजाड़े पत्ता-पत्ता।
सत्य कथ्य पीयूष, कभी विष होती सत्ता।।

नेताओं ने जो नहीं, तजे ठगी के काम।
निर्वाचन में देखना, होगा काम तमाम।।
होगा काम तमाम, रहेगा नहीं ठिकाना।
जाति-धर्म उत्पात, चलेगा नहीं बहाना।
कालेधन को ख़ूब, लुटाया आकाओं ने।
संविधान की लाज, उतारी नेताओं ने।।

काले नोटों से भरे, कुछ बोरों के ढेर।
निर्वाचन के दौर में, रहे कुबेर बिखेर।।
रहे कुबेर बिखेर, कराते खल शैतानी।
रूढि़ अन्धविश्वास, कथायें कहें पुरानी।
वैज्ञानिक परिवेश, सुहाते नहीं उजाले।
लोकतंत्र विपरीत, चलाते धन्धे काले।।

-डॉ.तुकाराम वर्मा, लखनऊ

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