Thursday, March 19, 2015

कुण्डलिया छंद

बरगद रोया फूटकर, घुट-घुट रोया नीम।
बेटों ने जिस दिन कि ये, मात-पिता तकसीम।।
मात-पिता तकसीम, कपूतों ने कर डाले।
तोड़ दिये सब ख्वाब, दर्द के किये हवाले।
बेटे को दे जन्म, हुई थी माता गद्गद।
आज तड़पती देख, फूटकर रोया बरगद।।

                              2
अपनी-अपनी सोच है, अपनी-अपनी पीर।
रम्भा चाहे नग्रता, धनिया चाहे चीर।।
धनिया चाहे चीर, लाज है उसको प्यारी।
पास नहीं हैं दाम, करे क्या संकट भारी।
रम्भा का है ख्वाब, दिखाये काया चिकनी।
घटा रही नित चीर, सोच है अपनी-अपनी।।
-रघुविन्द्र यादव 

0 comments:

Post a Comment