Wednesday, February 18, 2015

नारी का हृदयस्पर्शी चित्रण-एक चेहरा

कविता मानव हृदय में पल्लवित कोमल विचार है। कवि संवेदनशील विचारों के धनी होते हैं, जब उनका कोमल हृदय किसी घटना या विचार को शाब्दिक स्वरूप प्रदान करता है तो कविता आकार लेने लगती है। कविता मानवीय भावों की सर्वाधिक रसमयी अभिव्यक्ति है। लगभग पचीस वर्षों से अनवरत भक्ति-गीतों की रचना में संलग्न लेखक राजेश प्रभाकर का यह प्रथम कविता संग्रह है-एक चेहरा। इसमें अठ्ठावन कविताएं संकलित हैं और सभी कविताओं का प्रधान विषय नारी आधारित ही है। यूं तो नारी हमारे समाज का एक ऐसा विषय है जिस पर बड़े-बड़े विद्वान बड़े-बड़े विचार, चर्चाएं व लेखन कर चुके हैं। लेखक ने नारी के अस्तित्व व गरिमा पर लयबद्ध कलम चलाई है। उनकी हर कविता सरस व मर्मस्पर्शी है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता’ की परंपरा के पोषक कवि ने नारी के विविध रूपों का सजीव चित्रण अपनी कविता के माध्यम से किया है। नारी के रूप अनगिनत है। वह मां, बेटी, बहन, पुत्री, प्रेमिका, पत्नी सभी रूपों में पुरुष का संबल है। नारी ईश्वर की अनुपम कृति है। लेखक ने अपनी प्रथम रचना में ही इस बात का प्रमाण दिया है :-
शून्यवाद में परिकल्पित
प्रथम तेरी ही अनुभूति
ईश्वर की भी तुम्ही हो लगती
प्रारंभिक एक कृति
मनुष्य के जीवन में यदि कोई उसकी प्रथम शिक्षिका, पथ प्रदर्शिका, शुभचिन्तक है तो वह मां है। लेखक ने अपनी अद्भुत कल्पनाशीलता द्वारा मां के विराट रूप का दिग्दर्शन कविताओं के माध्यम से कराया है। यूं तो लेखक ने नारी के हर रूप पर अपनी लेखनी चलायी है परन्तु मां की ममता पर उनकी लेखनी कुछ अधिक ही सरस, वात्सल्यमयी व भावप्रवण हो उठी है। ‘मां’ पर लिखी उनकी कविताएं गरिमापूर्ण ऊंचाई को छू लेती हैं :-
मां एक शब्द,
शब्दकोश पर भारी है
जीव-प्रकृति-नृविज्ञान में,
ममता सबसे भारी है
मां का अर्थ बताए कौन?
शब्दकोश भी हुआ है मौन!
लेखक ने नारी रूप की अद्भुत व्यंजना की है। उनके काव्य में नारी अपने विराटतम व सुन्दरतम रूप में दृष्टव्य है, वही सृष्टि का आदि और अंत है। ईश्वर के उपरांत ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना यदि कोई है तो वो नारी ही है। नारी सृष्टि का सौंदर्य है :-
करूं कल्पना इस दुनिया की
तुम बिन जब-जब हे नारी
लगती है इक उजड़ी बस्ती
मुझको तो दुनिया सारी
बिन फूलों के जैसे उपवन
बिन सावन के जैसे मधुबन
पर तेरा जीवन एक तपोवन
जिसमे है अर्पण ही अर्पण
लेखक ने बड़ी ही भाव प्रवणता व सहृदयता से कन्या-भ्रूण हत्या के विरोध में भी अपनी कोमल अभिव्यक्ति दी है :-
जब मैं कली बनकर खिल जाउंगी
मां तेरे आंगन को महकाऊंगी
सपने मुझे भी सजाने दे मां
आने से पहले न जाने दे मां
ऐसी पंक्तियां बड़ी मर्मस्पर्शी हैं व कठोर हृदय पर भी आघात करने में सक्षम हैं। इस कविता संग्रह को पढने के उपरांत जयशंकर प्रसाद की अद्भुत कृति का स्मरण हो आता है :-
‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग, पग-तल में,
पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में 77′
लेखक का कोमल हृदय व भाव प्रवणता उनकी कविताओं की भाषा में परिलक्षित होती है। उनका वात्सल्य पक्ष सर्वोत्कृष्ट रहा। प्रेयसी व जीवन संगनी के निरूपण में वियोग श्रृंगार देखने मिलता है। नारी के त्याग, प्रेम, समर्पण, निवेदन, प्रणय के हृदयस्पर्शी चित्रण हैं। कवि की भाषा विषयानुकूल शुद्ध, सरल व परिमार्जित है। उनकी कवितायें जन मानस पर अमित छाप छोड़ेंगी ।
डॉ. रश्मि
०पुस्तक : एक चेहरा
०लेखक : राजेश प्रभाकर
०प्रकाशक : नीला प्रकाशन, नारनौल (हरियाणा)
०पृष्ठ संख्या : 112 ०मूल्य : रुपये 200.
देनिक ट्रिब्यून से साभार 

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