Saturday, June 27, 2015

लघुकथा - नहले पर दहला

रघुविन्द्र यादव की लघुकथा 

"शेर के आतंक से परेशान जंगल के जानवरों ने शेर से भेंट करके तय किया कि हर रोज़ एक जानवर शेर के भोजन के लिए खुद उसके पास जाएगा और शेर किसी को नहीं मारेगा|
कुछ दिन बाद एक खरगोश की बारी आई तो वह देर से गया| गुस्से से तमतमाए शेर ने कहा-"एक तो तू छोटा-सा ऊपर से देर से आया है|” 
“क्या करता महाराज, रास्ते में दूसरा शेर मिल गया था, बड़ी मुश्किल से बचकर आया हूँ|”
“हमारे क्षेत्र में दूसरा शेर? चलो दिखाओ|”
“महाराज इस कुएं में है|”
शेर ने झांककर देखा तो परछाई दिखी| दहाड़ा तो कुएँ से भी आवाज आई| शेर ने कहा-“हाँ भई, शेर तो है, मगर ये तो बिलकुल मेरे जैसा दिखता है और दहाड़ता भी मेरी ही तरह है, जरुर मेरा ही भाई है जो शायद बचपन में कुएं में गिर गया होगा| चलो जंगल में जाकर कहो आज से एक नहीं दो जानवर भेजेंगे, एक मेरे लिए और दूसरा मेरे भाई के लिए|”

कुमार सुनील की कविता

ये कुछ अजीब नहीं लगता 
की आप उनसे सवाल करें अपने 
गांव के बारे में 
और वे कथक की भावभंगिमाओं पर 
व्याख्यान देने लगें 
कई बार मुझे लगने लगता है 
मैंने दर्शनशास्त्र की कक्षा में 
पराठे बनाने की रेसिपी पूछ ली है 
ऐसे अवसरों पर उन्हें मैं शामियाने में 
खामखा घुस आये 
कुत्ते सा लगता होऊंगा 
कल ही तो एक अदना सवाल किया था 
पिछले दिनों मर गए किसान के बारे में 
और विदेश निति पर भाषण पिलाने लगे 
हद तो तब हो गई 
जब उनसे कहा 
बाबू जी हम कहाँ से खाएं दाल रोटी 
भाव दो देखिये जरा 
तो बोले 
काहे दिमाग का दही किये जा रहे हो 
काल रेट देखिये कितना सस्ता किये हैं 
जी भर के बतियाया कीजिये अब 
दाल रोटी के बिना मर थोड़े ना जाएंगे 
और भी बहुत कुछ है खाने को । 

बहुत से सवाल 
उस मितली की तरह होते हैं 
जो पेट में घुमड़ती तो है 
पर बाहर नहीं आती 
ये बड़ा तकलीफ देय होता है 
डर लगता है सवालों 
की उलटी से 
हो सकता है आपके सवाल बाहर 
निकलने से पहले ही 
आपका गला घोंट दिया जाये 
या आपकी गली सड़ी लाश 
गन्दे नाले में मिले 
कुछ भी हो 
ये सवाल जरूरी भी होते हैं 
लेकिन इस लोकतंत्र ने 
इतनी आज़ादी कहां दी है 
एक आम आदमी को 
की वह प्रधानमन्त्री की मेज पर 
सवालों की उल्टी कर सके ।

कविता - कम्मी ठाकुर

मैं समझ नहीं पाया

मैं अभी तक
समझ नहीं पाया
आखिर कैसे
युग-युगातंर की अच्छाई और सच्चाई
एक पल में
झूठ व बुराई से
हार जाती है
क्यों वर्षों के तप, यश,
सद्कर्म, धर्म और भलाई की कमाई
एक छोटी-सी भूल छीन लेती है

मैं आज तक
समझ नहीं पाया
दुनिया में अच्छाई, सच्चाई
और बुराई की सांकेतिक परिभाषा
क्योंकि अच्छाई और सच्चाई की डगर
संयमित, कठोर और विशाल
पदबंदो के बावजूद
अपने उसूलों, सिद्धांतो, नैतिकता
और मानवीय मूल्यों की स्थापना में
सदैव सीमान्त सैनिक की भाँति
अडिग, सतर्क और सावधान रहती है
किंतु फिर भी एक छोटी-सी
बुराई की गोली और बोली
उस कवचयुक्त सच्चाई और अच्छाई
की प्रतिमा को पलभर में
विखंडित कर उसे बदनाम कर देती है
फिर सच्चाई और अच्छाई को
अपने वजूद की खातिर
दुनिया में यदा-कदा-सर्वदा
महाभारत लड़़नी पड़ी है
भीष्म प्रतिज्ञा करनी पड़ी है
फिर भी आज स्थिति वहीं खड़ी है
इसके विपरीत अच्छाई व सच्चाई को
अपना अस्तित्व साबित करने के लिए
लम्बा संघर्ष करना पड़ता है
राम को वनवास,
भरत को सिंहासन त्याग,
पांडवों को अज्ञातवास
और कुमार श्रवण को
चार धाम से गुजरना पड़ता है
किंतु फिर भी आखिर क्यों
बुराई का साम्राज्य शाश्वत् है
और इंसां उस पर आशवस्त है
यह ज्ञात होते हुए भी कि
रहती सदैव अन्त में
विजय, अमर बाईबल, कुरान,
गुरू ग्रन्थ साहिब और गीता भागवत है
गीता भागवत है।

 कम्मी ठाकुर ‘‘मुसाफ़िर’’

ग़ज़ल - कृष्णा कुमारी 'कमसिन'

जब तू पहली बार मिला था
दिल इक गुञ्चे–सा चटका था

धूप में बारिश भीग रही थी
इन्द्रधनुष में चाँद खिला था

तू चुप था यह कैसे मानूं
मैंने सब कुछ साफ सुना था

सच ही मान लिया क्या तू ने
वो तो मैंने झूठ कहा था

अपनी हथेली पर मँहदी से
मैंने तेरा नाम लिखा था

दुख में मुझको छोड़ गया क्यूँ
तू ही तो मेरा अपना था

उस बारिश को कैसे भूलूँ
जब मैं भीगी, तू भीगा था

वो लम्हे कितने अच्छे थे
जिन मे तेरा साथ मिला था

उस दिन तुझ से मिलकर “कमसिन”
घर आकर इक गीत लिखा था